बिहार में डिजिटल और सामान्य रैलियों वाले ‘मिले-जुले’ चुनाव अभियान को मंजूरी दे सकता है चुनाव आयोग

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नई दिल्ली: चुनाव आयोग आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के लिए संभवत: वर्चुअल और सामान्य रैलियों के मिले-जुले प्रारूप वाले प्रचार अभियान का विकल्प अपना सकता है.

अधिकारियों ने दिप्रिंट से कहा कि पूरी तरह डिजिटल अभियान को लेकर कुछ विपक्षी दलों की तरफ से चिंताएं जताना एकदम निराधार है क्योंकि चुनाव आयोग ने कभी नहीं कहा कि यह इसी तरह होगा.

राजनीतिक दलों को भेजे एक पत्र में चुनाव आयोग ने चुनाव अभियान और जनसभाओं के बारे में पार्टियों के विचार और सुझाव 31 जुलाई तक मांगें हैं, ‘ताकि महामारी के दौरान चुनाव कराने के लिए प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों के चुनाव अभियान संबंधी आवश्यक दिशानिर्देश तैयार किए जा सकें.’

चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम नहीं बताने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, ‘हम नियमित रूप से पार्टियों के संपर्क में हैं और उनके सभी विचारों का ध्यान रखते हैं. लेकिन फिलहाल तो हम यही कह सकते हैं कि यह डिजिटल और सामान्य प्रचार अभियान का मिश्रित रूप होगा.’

हालांकि, अधिकारी ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग ये सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि अभियान आपदा प्रबंधन अधिनियम के प्रावधानों के अनुरूप हो.

चुनाव आयोग के उस बयान कि किसी भी मतदान केंद्र पर 1,000 से अधिक मतदाताओं को वोट डालने की अनुमति नहीं होगी, का हवाला देते हुए अधिकारी ने कहा, ‘उदाहरण के तौर पर भले ही हम फिजिकल कैंपेनिंग की अनुमति देते हैं, हम एक लाख लोगों को रैली में जाने की अनुमति नहीं दे सकते… इसलिए, हम उन लोगों की संख्या सीमित करने का तरीका निकालेंगे जो रैलियों में शामिल हो सकते हैं, जैसे हमने एक मतदान केंद्र में वोट डालने वाले लोगों की संख्या सीमित की है.’

विपक्ष की चिंता

कई विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग से आग्रह किया है कि कोविड-19 की स्थिति को देखते हुए अक्टूबर-नवंबर में प्रस्तावित बिहार चुनाव स्थगित कर दिए जाएं. ताकि कहीं ऐसा न हो कि चुनाव ‘सुपर-स्प्रेडर इवेंट’ बन जाए.

उन्होंने चुनाव आयोग को यह भी बताया है कि डिजिटल अभियान वास्तव में भेदभावपूर्ण है क्योंकि आबादी के एक बड़े तबके के पास तक स्मार्टफोन की पहुंच नहीं है.

पिछले हफ्ते चुनाव आयोग को लिखे एक पत्र में कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, माकपा और अन्य दलों ने कहा था, ‘चुनाव प्रचार के असामान्य अनुपात वाले इस प्रारूप को आधिकारिक रूप से मंजूर करना एक तरह से व्यवस्था का मखौल उड़ाना होगा जो न केवल बेहद सीमित पहुंच वाला है बल्कि अपनी डिजाइन के कारण सर्वमान्य भी नहीं है.

पत्र में कहा गया है इससे लगभग दो-तिहाई मतदाता इस प्रक्रिया से बाहर हो जाएंगे. इस संदर्भ में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण के आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया गया कि बिहार की आधी से अधिक आबादी के पास एक मोबाइल फोन है और केवल 34 प्रतिशत लोगों के पास स्मार्टफोन है.

राजनीतिक दलों का कहना है, ‘स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराना और सभी प्रतिभागियों और राजनीतिक दलों को समान मौके मुहैया कराना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है.’

राजनीतिक दलों ने इससे पहले 65 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं के लिए पोस्टल बैलेट के प्रावधान की अनुमति देने का जमकर विरोध किया था. इसके बाद चुनाव आयोग ने घोषणा की थी कि बिहार में वह ये प्रावधान लागू नहीं करेगा.

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